हुड़की बोल मा गाईन्दी यो गाथा, सूर्जा कुंवर की।
सूर्जा कुंवर छयो राजपूतों को छोरो,
जैका भुजा मा बल छयो, हिया मा आग।
जब दुश्मन को राजा ऐगे फरमान:
माथो नवाओ, नजराना दौ, नी त मिटाई द्यूलू।
सूर्जा बोलदो: मेरो माथो सिरफ ईश्वर आगे झुकदो,
तेरो फरमान मैं चूल्हा मा जलाऊंलो।
तब गुस्सा चढ़ो दुश्मन राजान,
भेजे सौ सवार, सौ तलवार, सौ भाला।
सूर्जा की जिया तब बोल्दी:
बेटा, यो लड़ाई तेरी अकेला की नी छ,
भागी चल, किला मा लुकी जा।
सूर्जा कुंवर हँसदो बोलदो:
जिया, भागणो कायरों को काम छ,
मैं छऊँ रजपूत, मेरो खून मैदान मा बैलो,
पर मेरी पीठ बैरी नी देखलो।
तब माता बांधदी राखी, रक्षा-सूत्र,
जब तक यो धागो छ, कुई शस्त्र तैं नी काटलो।
सूर्जा तब सिंगार सजाये:
पागड़ी बांधे, तेग कमर बांधे, ढाल धरे,
घोड़ा चढ़ीक निकले अकेलो।
सौ सवारू मा घुसीगे सूर्जा, जनी शेर भेड़ों मा,
तलवार चमकाई, एक मारो दाईं, एक मारो बाईं,
गिरन्दा गिरन्दा, फिर उठदो सूर्जा।
पर पीछू से एक बाण ऐगे तीर, छल से,
काटी दिन्यो रक्षा-सूत्र, माता को धागो टूट्यो।
सूर्जा को बल कमजोर ह्वैगो,
पर फिर भी लड़दो रैगो, गिर-गिर उठदो।
आखिर मा सूर्जा गिरीगे, पर मुख मा हास छयो:
मैं जीतों मरूंदो, पर हारीक नी।
दुश्मनों भी बोल्या: यो छौ असली मर्द,
इनू वीर हमन नी देखो।
हुड़की बजदी, गाथा गाईन्दी:
सूर्जा कुंवर अमर छ, जब तक पहाड़ छन।

