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रणू रौत — भाग 2

गढ़वाली लोक-गाथा

रणू रौत के पराक्रम और बलिदान की कहानी का दूसरा भाग।

Story Summary (English)

Ranu Rout Part 2 concludes the tragic ballad. Ranu senses betrayal when his wife serves sour food. His mother redirects his fury toward Meghu Kaluni, come to abduct their betrothed bride Syunsala. Ranu and Jhankru ride together to stop Meghu. They defeat all wedding guests, but Meghu shoots one treacherous arrow piercing both brothers. Syunsala refuses Meghu and immolates herself between the fallen warriors. A testament to Garhwali values: honor in death, loyalty unto the pyre, and justice through sacrifice.

तेरो आज मेरा द्यूर नाश होण,

तिन त बोले दिदा माल दूण मरीगे।

तब राणी उन्डू देखदी फुण्डू,

झंक्रू सेकुली बन्द करील।

रणू धाई लगौन्द राणी राणी-

मेरा वास्ता राणी अमल भन्याल।

मैं छऊँ राणी नौ बेली को भूको,

मैंक बणौ राणी निरपाणी की खीर।

दई दूद जु छयो खैली छौ झंकरुन,

तैन छंछेड़ी पकैले अर बोले-

आवा स्वामी भोरजन होइगे।

रणू रौत देखद छँछेड़ी को थाल,

तैका सिर का बाल खड़ा होइ गैन।

मैं माल की दूण ही केक नी मन्यो?

मैंक तई रांड केक पकाए खट्ठो भोजन?

रणू रौत न खैंचे शमशेर,

आज रांड का टुकड़ा टुकड़ा करदौं।

झंकरु तब कम्पण लैगे थरथर

सेकूली को तालो खकटाणा लैगे।

तब पूछन्द रणू रौत भिमला,

सेकुली पर तिन क्या चीज छ धरे?

सेकुली पर स्वामी बिराली का बच्चा।

भ्वां गाड दौं मेरी राणी, ऊँ दूद भात खलौला।

जनो कदों रणू सेकुली पर मार,

झंक्रू भायीक ओबरा लूकद।

ओबरा रन्दी छई राणी अमरावती-

तब झंक्रू नानी का खुटू मा पड़द,

राणी अमरावती तब वै लुकौन्दी।

बबराँदो-खलांदो रणू रौत तब,

पौछन्द मां का मास।

बतौ मेरी जिया मेरी जनानी को जार।

यख नी आये कुई मेरा रणू,

त्वैन सुपिनो त नी देखे।

देखदौं कनी छन तेरी होई लाल आंखी,

केक तै तिन या तलवार हात लिने?

घर मू लड़नक होन्दो शेर।

जा मार खोड़ की लगोटी,

अपणी तरवार म्याना पर धर।

जनानी का खातिर तू भाई न मार,

तेरी पीठ सूनी होली।

भाई का खातिर राणी न मार,

तेरी सेज सूनी होली!

जु तू इनु छई वीर, मेरा रणू त सूण,

तुमारा बाबू की माँगणी बोलीं छै,

स्या राणी स्यूंसला।

आज तैंको डोला मेघू कलूणी छ लिजाणू।

सूण्या जिया का बचन,

रणू रौत खड़ो होई गए-

तू इनु क्या बोनी मेरी माँ जी,

मेघू कलूनी मैं ज्यूंदा नी छोड़ौं।

तब झंक्रू भी वैका साथ ह्वेगे

दिवालीखाल सजीं छै बरात।

तख तौंन सब बराती मारी दिनेन।

मेघू कलूणी लुकी गए बोटगा का पेट।

झंक्रून बोले-दिदा, तमाखू खाण बैठ्याल।

विराणो रस्ता बेरी होन्द।

हम यख मू तमाखू नी खांदा,

हम केकी डर छै दिदा,

जु तुमू छ त पीठी मिलैक बैठला,

तू उण्डू देख, मैं फुण्डू।

मेघू कलूणी तोंका तौं दोबणू छौं,

तैन लुकीक एक बाण इनु मारे

जु रणू की छाती घुसे

झंक्रू की छाती भैर आये।

पकोड़ा सी दुये छेदेइ गेन,

हरीं आंखी ह्वैन तौंकी पिंगला केस,

दुयौं का पराण उडी गैन।

तब औन्द मेघू स्यूंसला का पास

मारदो लात वीं का डोला पर।

तब स्यूं सला इना बैन बोदी:

मैंन रन्त नी दिने रैबार,

जना अफू आई छया वो, उना अफू मरि गैन।

तुम छन मेरा सिर का भरता

पर अधर्मा न होयान।

यूं दुई मालू की गाति करी देवा मुगति।

लगाये द्वि मालू को एकी बोज,

रवि छाला वैन ऊंकी चिता रंचे

देखदी रै हेरदी पैली स्यूंसला,

फेर छट उछले चिता बढ़ो गये,

द्वि मालू का बीच वा सती होई गये।

उण्डु हेरद फुण्डो मेघू कलूणी,

यो मैक तैं क्या होये?

सेयूं सी जागे वो, चेत आयो?

यो लोक-गाथा गढ़वाल की मौखिक परम्परा का हिस्सा छ — पीढ़ी दर पीढ़ी सुणाई जांदी रही छ।

यो गाथा का बारे मा घुघुती AI सी पुछण च त घुघुती AI मा जा।

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