सुणो सुणो भाई बैणो, यो छ कथा राजुला मालूशाही की।
बैराठ गढ़ मा रन्द छयो राजा दुलाशाही,
वैकी राणी छई सुनपति, सुघड़ चतुर सलोणी।
बैराठ को माल छयो हरो-भरो, गाडू गंगा बगन्दी,
धारू मा बुरांस फूलन्दा, डाँडू मा देवदार।
राजा दुला को बेटो मालूशाही, जनम ही रूप को भण्डार।
कांठू मा को सूरज जसो, गाडू मा बगन्दी गंगा जसो,
फूलू मा बुरांस जसो, मालू मा को माल छयो मालूशाही।
उधर रंग महल मा रन्द छयो सौदागर सूनपति हुणिया,
वैकी बेटी राजुला, अगास की तारा जसी,
चंद्रमा की चाँदनी जसी, बरफ की धवली जसी।
माता सुनपतिन पैली ही ठैरायो छयो ब्यौ-
मेरी बेटी राजुला, बैराठ का मालूशाही का ब्वैण।
पर बाबा नी माणदो, कन्दो वो हुणियन मू:
मेरी नौनी पहाड़ी राज मा नी द्यूंलो,
मेरी राजुला रंग महल मा ही रैली।
तब मालूशाही सुपिना मा देख्यालो राजुला-
जनी बरफानी फूल, जनी चाँदनी रात,
तैकी आँखी मा तारा, तैका मुख मा चन्दरमा।
तब जागीक मालूशाही बोलदो: मैं जाणू यो राजुला,
मेरा लिख छ वा, मैंन ढूंढणू वा।
जिया बोन्दी: बेटा, रंग महल दूर छ,
काँठा बीच, बरफ बीच, डाकू बीच।
पर मालूशाही नी माणदो, लैरेन्द-पैरेन्द,
घोड़ा चढ़ीक निकले बैराठ से।
डाँडू टपे, गाडू बगे, कांठा चढ़े,
बरफ का रस्ता मा गुजारो करदो करदो,
पौंछी गए वो रंग महल।
राजुलान भी देखे छया सुपिना मा मालूशाही,
बांको ज्वान, हँसती आँखी, राजा को बेटो।
पर बाबान वैतैं भांग खलाई दिन्यो,
मालूशाही बेहोश पड़ीगे।
राजुला आन्दी रात को, देखदी वैतैं सोयो:
हे मेरा स्वामी, तू औन तबी मैं तेरी।
कछुक दिन बाद, मालूशाही जागीगे,
राजुला मिलीगे, दुयों का हाथ जुड़ीन।
तब बाबा भी मान गए, देव-संकेत देखीक:
यो जोड़ी स्वर्ग मा बणी छै, मैं कु छऊं रोकण वालो?
ढोल बजीन, शहनाई बजी, ब्वौ होई गए राजुला मालूशाही को।
बैराठ गढ़ मा खुशी छाई, रंग महल मा भी उत्सव होयो।
जुग जुग तक गाई जाली यो प्रेम गाथा,
राजुला मालूशाही की कथा अमर रैली।

