सुणो यो कथा नन्दा देवी राज जात की,
जो बारह बरस मा एक बार होन्दी।
नन्दा छन हमारी माता, पारवती का रूप,
गढ़वाल-कुमाऊँ की बेटी छन नन्दा।
वैनकू ससुराल भेजणू छ — कैलास।
शिव जी का धाम मा, हिमालय की ऊँची चोटी मा।
नौटी गाँव से शुरू होन्दी यात्रा,
चौसिंग्या खाडू — चार सींग को मेंढ़ो — आगे-आगे।
ढोल-दमाऊ बजन्दा, रणसिंगा फूंकन्दा,
गाँव-गाँव का लोक जुड़न्दा, मील-मील लम्बी कतार।
पैली रात भगवती का थान मा रुकन्दी,
दूजी रात देवल का थान, तीजी रात कुण्डा।
हर गाँव भेंट चढ़ौन्दो — फूल, चावल, घी,
नन्दा देवी की डोली मा सजाइन्दा।
ऊँची-ऊँची डाँडी टपन्दी जात,
बरफानी हवा मा भी नी रुकन्दी।
कुछ लोक बोलन्दा: नन्दा देवी रोन्दी ससुराल जान्दी,
जनी हर बेटी रोन्दी विदा मा।
लाट मा आग जलन्दी, पंडित मन्त्र पढ़न्दा,
होमकुण्ड की बरफ मा पौंछन्दी जात।
तख चौसिंग्या खाडू छोड़ दियेन्दो,
वो जान्दो — कबी नी लौटन्दो।
लोक बोलन्दा: वो कैलास पौंछी गए,
नन्दा देवी ससुराल पौंछी गईन।
गढ़वाल का लोक लौटन्दा — आँख्यों मा आँसू,
पर मन मा शान्ति: हमारी नन्दा सुखी छ।
बारह बरस बाद फेर जात निकलली,
फेर नन्दा औलीं मायके, फेर ससुराल जालीं।
यो परम्परा चलदी आई छ सदियों से,
जब तक हिमालय छ, नन्दा देवी राज जात रैली।

