सिरीनगर गढ़ मा राज करदो छयो मादो महेश पंवार,
जैकी तलवार मा बिजली छई, जैका दिल मा न्याय।
राज-तिलक ह्वैगे मादो को सिरीनगर मा,
पंडितों मन्त्र पढ़ीन, देवता साक्षी रईन।
राजा बोल्दो: मेरा गढ़वाल मा,
गाडू मुक्त बगलीं, कांठा खुला रैला,
कुई यात्री मेरा राज मा भूखो नी सोलो।
तब चलीन वैकी सैना — पूरब, पच्छिम, उत्तर,
पहाड़ी राज जीत्या, सीमा बढ़ाई।
पर मादो महेश सिर्फ लड़ाकू नी छयो,
वो न्यायी भी छयो, बुद्धिमान भी।
जमीन का झगड़ा सुलझाये,
गुल (सिंचाई नहर) बनवाये,
व्यापारियों तैं सुरक्षा दिन्यो।
वैका दरबार मा कवि गान्दा, नर्तकी नाचन्दी,
माघ मेला मा तिब्बत, नेपाल, मैदान से सौदागर औन्दा।
गढ़वाल को सोना-काल छयो मादो महेश को राज,
धर्म फूल्दो, संस्कृति खिलन्दी, प्रजा सुखी।
पर एक दिन उत्तर सीमा से दुश्मन ऐगे,
मादो महेश अफू सैना लेक गए।
भीषण लड़ाई — तलवारों की झनकार,
मादो महेश लड़दो-लड़दो, एक बाण छाती मा लग्यो।
गिरीगे राजा — पर मुस्कौन्दो:
मैंन राज बचाये, मेरी ड्यूटी पूरी।
वैको शरीर ढाल पर रखीक लौट्या सैनिकों,
सिरीनगर मा बारह दिन शोक मनाइयो।
गढ़वाल रोयो — मादो महेश जसो राजा
फेर नी होलो, फेर नी होलो।
पर वैकी यादगार आज भी छ:
वो गुल आज भी बगन्दा, वो मन्दिर आज भी खड़ा।
मादो महेश — गढ़वाल को गौरव।

