गढ़वाल की रातों मा बहुत कथा सुणाईन्दी — भूत-प्रेत की।
या कोई साधारण डरौनी कथा नी छन,
या छन हमारी संस्कृति, हमारा विश्वास।
— पहली कथा: खाल की चुड़ैल —
ऊँची खाल (दर्रा) पर, जख अकेला रस्ता जान्दो,
रात को एक औरत दिखन्दी — सफेद कपड़ा, लम्बा बाल।
सुन्दर मुख, पर खुटा उल्टा — अगाड़ पीछाड़।
वा बोलन्दी: भाई, मैतैं आगे ली जा,
मेरा खुटा दुखन्दा, मैं चली नी सकदी।
जो रुकी गए — वो भटकी गए।
जो ना बोली — रामनाम जपी — वो बची गए।
बुजुर्ग बोलन्दा: रात को खाल मा अकेला मत जा,
जा भी त पीछा मत देख, बोलणो मत बोल।
— दूजी कथा: देवदार वन को झ्यूंता —
देवदार का जंगल मा रन्दो छ झ्यूंता,
वो रूप बदलन्दो — कबी आदमी, कबी जानवर।
लकड़हारा जंगल मा जान्दो, तब सुणन्दो:
कुई पुकारन्दो वैको नाम — जानी-पछाणी आवाज मा।
पर वो आवाज झ्यूंता की छ —
जो पीछा गए, वो गहरा जंगल मा खोई गए।
बचणो का उपाय: अपणो नाम मत बोल,
आग जला, धुआँ कर — झ्यूंता धुएँ से डरन्दो।
— तीजी कथा: चन्द्रबदनी को भैरो —
चन्द्रबदनी मन्दिर का पास रन्दो छ भैरो देवता,
रक्षक छ वो — मन्दिर को, जंगल को, गाँव को।
जो मन्दिर मा गन्दगी करदो, वैतैं सजा मिलन्दी:
रात को भैरो ऐन्दो — ढम-ढम-ढम,
दरवाजा हिलन्दो, बर्तन गिरन्दा,
जब तक गलती माफी नी मांगन्दी।
एक बार एक शिकारी ने मन्दिर मा जानवर मारो,
वो रात शिकारी को भैरों आयो:
सात दिन बुखार, सात रात बोलणो बन्द।
जब पंडित ने पूजा करी, माफी मांगी,
तब शिकारी ठीक ह्वैगे।
गढ़वाल मा हर पेड़, हर गाड, हर कांठा मा आत्मा छ,
सम्मान करो — त रक्षा करन्दा,
अपमान करो — त सजा देन्दा।
यो छ हमारो विश्वास, यो छ हमारी संस्कृति।

