गढ़वाल की ऊंची बुग्यालों मा, जख बरफ ही बरफ होन्दी,
तख रन्द छयो एक बूढ़ो ग्वाला — भोला नौंन छयो वैको।
भोला की भेड़ा चरन्दी छईं बुग्यालों मा,
वैको साथी छयो एक कुत्तो — गाडू।
गाडू छयो भूरो-कालो, कन्दूड़ों जसो बड़ो,
पर दिल मा माया ही माया छई वैकी।
भोला बोन्दो: गाडू मेरो बेटो छ,
मेरी बुढ़ापा मा वो ही सहारो छ।
एक सर्दी मा भारी बरफ गिरी,
आँधी चली, कुछ दिखन नी लग्यो।
भेड़ा भाग गईं इधर-उधर,
भोला गिरी गए ठण्ड मा, हिलणो बन्द।
गाडू भौंकदो रैगो, भेड़ियों दूर भगाये,
अपणो गर्म सरीर भोला पर रखे।
पंजा फाटीन वैका, खून बग्यो बरफ मा,
पर गाडू खींचदो रैगो भोला तैं गाँव की तरफ।
सारी रात — बरफ, ठण्ड, अन्धेरो —
गाडू नी छोड़ो अपणो मालिक।
सवेरा ह्वैगे, गाँव का लोक ऐन ढूंढण,
देख्याले भोला पर पड्यो छयो गाडू,
जमीन मा खून को निशान, गाडू का पंजा का।
दुयों जिन्दा छया — गाडू की वफादारी से।
भोला जागीक बोल्दो: मेरो गाडू,
तू मनखी से बढ़ीक छ, तू देवता छ।
गाँव का सब लोक गाडू पूजन लग्या,
वैतै दूध-भात खलौन, माला पैराइन।
गढ़वाल मा आज भी बोलन्दा:
वफादारी गाडू जसी, प्रेम गाडू जसो।
जब तक पहाड़ छन, गाडू की कथा रैली।

