गढ़वाल की डाँडियों मा घूमदो छयो एक जोगी,
नाथ पंथी, भभूत रमाए, डमरू बजाये — भाना गंगनाथ।
वैका हाथ मा शक्ति छई, आँखी मा तेज,
बीमारों ठीक करदो, सूखा खेतों मा बरसात लौन्दो।
गाँव-गाँव मा वैकी ख्याति फैलीगे:
गंगनाथ बाबा ऐगे, गंगनाथ बाबा ऐगे।
एक दिन पौंछो वो बेलापाटणी का राज मा,
जख रन्दी छई राणी बेलापाटणी — रूपवती, बुद्धिमती।
राणी सुणाले गंगनाथ की महिमा:
वो पाणी दूध बणौन्दो, नदी पर चलन्दो,
वो बांझ धरती मा फसल उगौन्दो।
राणी बोल्दी: मैं देखणू चान्दू या जोगी।
गंगनाथ ऐगे दरबार मा,
राणी देखदी — वैकी आँखी मा ब्रह्माण्ड दिखे,
वैकी बाणी मा अमृत छयो।
गंगनाथ देखदो राणी — जनी पार्वती को रूप,
जनी शक्ति को अवतार।
प्रेम जागो — नियम तोड़ीक, समाज तोड़ीक।
राणी जान्दी रात को गंगनाथ का आश्रम,
गंगनाथ बजाये डमरू, गाये भजन, राणी सुणन्दी।
पर राजा तैं खबर पौंछी:
मेरी राणी जोगी का पास जान्दी!
क्रोध मा राजान आदेश दिन्यो:
गंगनाथ तैं जिन्दो गाड़ दो भूमि मा।
सैनिक ऐन, गंगनाथ नी भाग्यो — हँसदो बोल्दो:
यो शरीर मिट्टी को छ, आत्मा अमर छ।
गाड़ दिन्यो वैतैं — पर लोक बोलन्दा:
मिट्टी मा से डमरू बजन्दो रै गयो,
धम-धम-धम, रात भर।
राणी बेलापाटणी श्राप दिन्यो राज तैं:
यो राज नाश होलो, यो वंश खत्म होलो।
वा जंगल मा गायब होई गई — कबी नी मिली।
गंगनाथ देवता बणी गए,
गढ़वाल मा जगह-जगह वैका मंदिर बणीन।
जागर मा वैकी पूजा होन्दी,
डंगरिया नाचन्दा, गंगनाथ बोलन्दा:
मैं अमर छऊँ, मैं हर जगह छऊँ,
जो मैंतैं पुकारलो, मैं तख ऐलूं।

