अजुआ छई सात बरस की जब बयाई गई बफौल,
बफौल घराण्या मा, बूढ़ा ज्वैन तैं।
खेलणा छयो वैन, कुदणा छयो,
पर बाँध दियो विधाता ब्वौ का बन्धन मा।
कुछ दिन बीत्या, ज्वैन मरी गए।
सात बरस की अजुआ — विधवा।
चूड़ी फोड़ दिन्या, बिंदी मिटाई दिन्या,
सफेद कपड़ा पैराई दिन्या।
अजुआ पूछन्दी जिया तैं:
जिया, मेरी सखी ता खेलन्दी छन,
मैं केक नी खेली सकदी?
सबी नौन्या फूल लगौन्दी छन,
मैं केक नी लगाई सकदी?
जिया रोन्दी, बोलन्दी:
बेटी, तेरा भाग मा यई लेख्यो छयो,
विधाता तैं कया बोलू?
अजुआ बड़ी ह्वैगे, पर जिन्दगी वई:
सवेरा से काम — चूल्हा, पाणी, गोबर, भैंसा।
कुई मेला नी, कुई त्यौहार नी,
कुई रंग नी, कुई हँसी नी।
गाँव की बड़ी औरतैं बोलन्दी:
यो अभागी छ, इनतैं दूर रैया,
इनकी छाया भी अपसगुन छ।
अजुआ एक दिन बोल्दी:
मैंन कया पाप किने जिया की कोख मा?
मेरो मुख खुलण से पैले मेरो भाग लेख्यो?
मैं कया छऊँ — मनखी या पत्थर?
मेरा भी दिल छ, मेरा भी सपना छा,
पर इनैं किन मारी दिन्या?
एक रात, चाँदनी रात मा,
अजुआ घर से निकल्दी, गाडू तरफ जान्दी।
कुई बोलन्दो: वा जंगल भागी गई,
कुई बोलन्दो: गाडू मा कूदी गई।
पर अजुआ की आवाज गूंजन्दी छ आज भी:
यो अन्याय छ, यो पाप छ,
बच्ची तैं विधवा बनाणो अधर्म छ।
गढ़वाल का समाज सुधारकों या गाथा सुणाई:
बाल-विवाह बन्द करो, विधवाओं पर अत्याचार बन्द करो।
अजुआ बफौल — एक कथा नी, एक चीख छ।

